Saturday, September 5, 2020

औरत का अपना घर नहीं होता

 

मां तुम कहती थीं
एक दिन तेरा अपना घर होगा
जहां तेरा अपना सब कुछ होगा
उसे छोड़ कभी जाना न होगा
पर मां तुमने यह बात नहीं बताया कभी
कि तुम सिर्फ बहलाया करती थी तब भी
औरत का कोई अपना घर होता नहीं कभी
इतनी सी बात मां तूने समझाई क्यों नहीं कभी।।

मां तुम कहती थीं
अपने घर में राज करना
अपने घर में जा मनमानी करना
अपने सपनों का घर बनाना
पर मां तुमने यह बात नहीं बताया कभी
कि तुम सिर्फ बहलाया करती थी तब भी
औरत का कोई अपना घर होता नहीं कभी
इतनी सी बात मां तूने समझाई क्यों नहीं कभी

मां तुम कहती थीं
बेटी तो पिता के लिए पराई
बहू है तो पराए घर से है आई
औरत तो हमेशा से रही पराई
पर मां तुमने यह बात नहीं बताया कभी
कि तुम सिर्फ बहलाया करती थी तब भी
औरत का कोई अपना घर होता नहीं कभी
इतनी सी बात मां तूने समझाई क्यों नहीं कभी।।

भगवान ने भी क्या किस्मत है बनाई
घर तो दो दिए पर नज़रों में दोनों के पराई
पिता का बोझ तो पति की जिम्मेदारी हुई
पर मां तुमने यह बात नहीं बताया कभी
कि तुम सिर्फ बहलाया करती थी तब भी
औरत का कोई अपना घर होता नहीं कभी
इतनी सी बात मां तूने समझाई क्यों नहीं कभी।।

डॉ सोनिका शर्मा


Thursday, September 3, 2020

श्राद्ध

राकेश जी हर साल की तरह इस साल भी अपने घर में अपने दादी बाबा और अपनी मां का श्राद्ध करने वाले है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि करोना जैसी महामारी फैली हुई है। वह अपनी ही धुन में मस्त है उनको जो करना है वह करना है फिर दुनिया चाहे जाए भाड़ में। राकेश जी आज इस उम्र के पड़ाव में आकर ऐसे नहीं हुए वह शुरू से ही ऐसे था उन्हें कभी किसी बात का कोई फर्क नहीं पड़ता जो उन्हें करना है वह करेंगे।

राकेश जी आज पूरा घर सर पर उठाए थे आज तड़के चार बजे से ही उनके घर से आवाजें आने लगी थीं वह पत्नी सुधा पर ज़ोर - ज़ोर से चिल्ला कर डांट रहे है अभी तक खाना नहीं बना पंडित के आने का समय हो चुका पता नहीं क्या कर रही हो। सुधा जी आदतन बिना जवाब दिए काम किए जा रही थीं। अब तक उन्हें राकेश जी के बड़बड़ाने की आदत पड़ चुकी थीं।
इसी बीच राकेश जी के पिताजी के कमरे से आवाज़ आती है आज कोई चाय पानी पूछेगा बूढ़े को या भूल गए।अब तो बारह बजने को आए है। उनकी आवाज़ सुन राकेश जी गुस्से में तमतमाते हुए उनके कमरे में जाते है और कहते है बाबू जी कल बताया था आज श्राद्ध है आज चाय पंडितों के खाना खाने के बाद ही मिलेगी फिर भी घर सर पर उठा रखा है। आप तो बचपने में चले गए हैं कम से कम उम्र का लिहाज रखिए। बाबू जी सिर झुकाए राकेश जी की पूरी बात सुनते है और फिर कहते है बेटा एक बात कहूं मेरे न रहने पर मेरा श्राद्ध न करना क्योंकि मैं नहीं चाहता कि जब तेरा बेटा हमारा श्राद्ध करे तो तुम्हें भूखा रहना पड़े।
राकेश जी अपने बाबूजी के मुंह से यह बात  सुन स्तब्ध रह गए। बाबूजी ने आगे कहा बेटा जो जीवित है उनको कष्ट दे कर भूखा रख कर पितरों को संतुष्ट करना कहां की रीति हैं? ज़िंदा बाप भूखा रहे और जो नहीं है संसार में उनके लिए इतना आडंबर क्यों?
बेटा राकेश याद है तुझे जब मैं तुम्हारे दादी बाबा का श्राद्ध करता था और तुम्हें स्कूल जाना होता था तब मैंने कभी भी तुझे भूखा घर से नहीं जाने दिया चाहे तब तक पंडित आ कर खा चुके हो या नहीं पर तुम्हें पितरों के भोजन के लिए भूखा स्कूल नहीं भेजा फिर आज इस बूढ़े बाप और बाकियों को क्यों भूखा प्यासा रखें हो।
हमारे पितृ हमारे घर आते है पर वह यह तो नहीं कहते कि जो जीवित है उन्हें भूखा रख कर उन्हें खाना खिलाओ। पितरों को खाना खिलाओ संतुष्ट करो पर जो जीवित है उन्हें कष्ट मत दो ऐसे भोजन से पितर भी संतुष्ट नहीं होंगे।
आज शायद राकेश जी को जीवन की बहुत बड़ी सीख मिली और वह चुपचाप जा कर आंगन में शांति से बैठ गए। थोड़ी ही देर में सुधा जी बाबू जी के लिए चाय कमरे में ले कर जाती है।


डॉ सोनिका शर्मा

Wednesday, September 2, 2020

तुम कहते नहीं

 

हमें तुमसे मोहब्बत है तुम्हें हमसे मोहब्बत है
मगर इतनी सी है यह बात कि तुम कहते नहीं और मैं छुपाती नहीं।।

तुम्हारे जज़्बात ऐसे है बिना बोले ही जिसे समझूं मैं
मगर इतनी सी है यह बात कि तुम बताते नहीं और मैं छुपाती नहीं।।

बस तुझमें और मुझमें इतना ही फर्क तो है
मैं दिल की हर बात बताती हूं और तुम हर बात बताते नहीं।।

मेरे लिए हो तुम खास और तुम्हारे लिए हूं खास मैं
यह एहसास तुम महसूस कराते नहीं और मैं कराने से खुद को रोक पाती नहीं।।


Friday, August 28, 2020

मैं ही हूं

 मैं हूं हां मैं ही हूं

एक बेटी एक पत्नी

एक बहू एक मां

एक सास 

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


पर इन सब से पहले एक स्त्री हूं

कोमल ह्रदय की

सुकोमल भावनाओं की

अनंत इच्छाओं की

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


रिश्तों के बोझ को

ढोती हुए

संस्कारों के बंधनों को

जकड़े हुए

रीति रिवाज के आवरण को

ओढ़े हुए

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


सबकी परवाह करती हुई

सबकी इज्जत करती हुई

सबकी इच्छाएं पूरी करती हुई

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


याद है कभी पूछा हो जो मुझसे

कैसे जीना चाहती हो जीवन को

कैसे रंगना चाहती हो सपनों को

कैसे सोचा है अपने जीवन को

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


कभी पूछा मुझसे

कैसे भुलाया अपने को

कैसे तोड़े सपनों को

कैसे भूली अपनों को

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।


हाड़ मांस की बनी हुई

जिंदा हूं पर मरी हुई

जीत कर भी हारी हुई

अपनों के बीच भी पराई हुई

मैं ही तो हूं

मैं हूं हां मैं ही हूं।।

Thursday, August 27, 2020

बेवफ़ा

 दुआओं में भी उसी को मांगा जो किस्मत में नहीं था

प्यार भी उससे किया जो अपना नहीं था

क्यों कहें तुमको बेवफ़ा

मुहब्बत भी उससे की जो तलबगार नहीं था।।

Sunday, August 23, 2020

छल

हर बार छला गया
हर बार ठगा गया

हर बार दर्द दिया गया
हर बार धिक्कारा गया

क्यों हर बार मैंने अपने साथ यूँ होने दिया
क्यों हर बार छलावे में छली गयी
क्यों हर बार ठगी में ठगी गयीं
अपने हाथों क्यों अपने को ही दर्द दिया।।

हर बार छला गया
हर बार ठगा गया

हर बार दर्द दिया गया
हर बार धिक्कारा गया

जिसे अपना मान कर अपना हमराज बनाया था
क्या पता था वही एक दिन मेरी ही नुमाईश करेगा
क्यों हर बार आँख बन्द कर ली
अपने हाथों क्यों अपने को ही बर्बाद किया।।

हर बार छला गया
हर बार ठगा गया

हर बार दर्द दिया गया
हर बार धिक्कारा गया

जिसे अपना मान पूरी दुनिया को पराया किया
आज उसी ने मुझे पराया बनाया
क्यों हर बार की तरह चुप रही
क्यों उसको अपने-पराये के बारे में नहीं बताया ।।

हर बार छला गया
हर बार ठगा गया

हर बार दर्द दिया गया
हर बार धिक्कारा गया



Monday, August 10, 2020

तू

तुझे सोच आज भी आंखे भर आती है
पर न जाने क्यों आज भी बेपरवाह हैं।
तू आज भी मेरे हर सवाल का जवाब है
पर न जाने क्यों तू आज भी बेखबर हैं।।

शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस की सभी को अनंत शुभकामनाएं आप सबके जीवन की पहली शिक्षिका तो माँ हैं पर दूसरी शिक्षिका या शिक्षक स्वयं जिंदगी है बहुत कुछ सिखाती ...