Thursday, May 6, 2021

एक विचार

 

आज दिन में अचानक विचार आया कि यह वास्तु दोष, घर बैठे कुंडली बनवाए, कृपा रुकी वाले बाबा, ग्रह शांति वाले पंडित जी यह सब अचानक से गायब हो गए। आज कल न तो कोई कोरोना की कुंडली बना रहा न विचार रहा, न कोरोना शांति हवन बता रहा और साथ ही साथ कोई यह भी नई बता रहा कि देश पर कृपा कहां से रुकी हैं कि कोरोना न तो जा रहा न खत्म हो रहा जड़ से न ही हम सब मिल कर इसे हरा पा रहे हैं।
यह सब बाबा, दादी, पंडित, दीदी सब के सब अपनी दुकान समेट गायब हो गए अब इन्हें न तो हमारे भविष्य की चिंता न देश की चिंता और तो और कोरोना को भागने का भी कोई दावा नहीं कर रहा हैं।
बस यहीं बताना चाहती हूं कि हम खुद ही इनके बिछाए अंधविश्वास के जाल में जा कर फंसते हैं। कोई पंडित, बाबा, दादी, दीदी, मां में शक्ति नहीं कि ईश्वर का लिखा मिटा सके या उसको बदल सके ये सिर्फ हमारा आपका भ्रम हैं कि फलाने ने यह उपाय बताया हमारा काम हो गया पर ऐसा नहीं हमारा काम होना था वह उसी समय पर हुआ आपको लगा कि अमुक की पूजा से हुआ ऐसा बिलकुल नहीं यही अंधविश्वास है जो बरसों से हमें खोखला किए है।
अब सब खुद सोचिए पिछले छः आठ महीने से आपको किस बाबा पंडित मौलवी की जरूरत पड़ी या किस जगह के चक्कर लगाए बिना आपका आठ महीना न कटा हो।
यह सिर्फ हमारे बनाए भ्रम है अंधविश्वास है जिन्हे हमें खुद दूर करना हैं। कोई किसी की नियति नहीं बदल सकता हैं। जो कर्म किए है उनका फल भोगना ही है बस यही नियति हैं। ईश्वर ही आपका रक्षक है उस पर भरोसा करिए यहां तक लाया तो आगे भी ले जाएगा। वैसे भी ईश्वर को हम परमपिता परमेश्वर मानते है फिर कैसे कोई पिता अपने ही बच्चों का गलत कर सकते हैं।
इसलिए अंधविश्वास से दूर रहिए ये पंडित मौलवी दादा दीदी बाबा और मां से दूर रहिए ईश्वर पर अटूट आस्था रखिए जो कर्म किए है वह भुगतने हैं इस में आपकी कोई मदद नहीं करेगा।
अपने इष्ट पर पूर्ण विश्वास रखिए जो आपके लिए बेहतरीन होगा वह वहीं देगा। जितना अंधविश्वास के पीछे भागोगे, भटकोगे उतना ही परेशान होगे और अपने दुःखों को बढ़ा लोगे।
समय जब अच्छा नहीं रुका तो खराब भी नहीं हो रुकेगा। अभी थोड़ा सब्र करना हैं जो हो रहा है ईश्वर की मर्जी और अपने कर्मों का भुगतान समझ कर शांति से रहिए। ईश्वर सर्वोपरि है उसके आगे हम कुछ भी नहीं। नियति को बदल नही सकते शांति से स्वीकार करने में भलाई हैं।
अभी बस इतना ही कर सकते है हम एक सामान्य मनुष्य की भांति व्यवहार करें जितना संभव हो सबकी सहायता करें सबके कष्टों को दूर करें, लोगों को सांत्वना दें उनकी तकलीफ़ को सुन कर बांटे यही सबसे बड़ा पुण्य हैं अगर हम किसी की भी किसी भी रूप में सहायता कर सकते है तो यहीं बहुत हैं।
ईश्वर से सम्पूर्ण सृष्टि के लिए प्रार्थना करें हमारे एवं सभी के कष्टों को हरने की प्रार्थना करें एवं सभी के लिए मंगल कामना करें।

डॉ सोनिका शर्मा

Monday, May 3, 2021

खुद की तलाश

 

कोरोना के इस आपातकाल में जहां चारों तरफ हाहाकार मचा हैं। चाहे न्यूजपेपर हो चाहे न्यूज चैनल चाहे सोशल प्लेटफार्म बस हर जगह नकारात्मकता फैली है। अगर गलती से कही गाहे बगाहे सकारात्मकता देखने को मिल जाए तो भी उसको नकारात्मकता के आवरण में लपेट दिया जाता हैं।
चारों तरफ बस यही संदेश है घर में रहें सुरक्षित रहें न बाहर जाएं ना ही बाहर वालों को घर पर बुलाएं उसके साथ यह भी ज्ञान मिलता है न्यूजपेपर से न्यूज चैनल से सोशल मीडिया प्लेटफार्म से नकारात्मक विचारों से दूर रहे। अब यह समझ के परे है कि जब सब से दूर रहे तो जाए कहां अपने को व्यस्त कहां करें कितना घर का काम साफ सफाई करें कितनी डिशेज बनाएं यह सब करने के बाद पुनः फिर वही खाली दिमाग शैतान का घर। अब इतनी नकारात्मकता चारों ओर फैली हो सर पर मौत मंडरा रही हो तब यकीन मानिए कुछ करने का मन नहीं करता हैं।
दिल और दिमाग बस दिन भर ऊल जलूल बातें सोचता और दिमाग में लाता है। दिमाग में सट लगी रहती है कही किसी के यहां से कोई बुरी खबर ना आ जाए और तो और मोबाइल की घंटी अगर बजी तो जब तक फोन उठ न जाए जाने कितने विचारों का आवागमन हो जाता है यह तो बस पूछिए ही मत।
इसी बीच सोचा चलूं खुद को वापस पुरानी चीजों में ढूंढा जाएं और उसके लिए अपनी किताबों की अलमारी की दराज़ की खोज़बीन शुरू की सबसे पहले कुछ पुरानी किताबें मिली जिन्हें देख कर मन ऐसे प्रफुल्लित हुआ मानो बरसों का पुराना गड़ा खजाना मिला हो अब उसको उल्ट पलट कर पुरानी लिखावट और उससे जुड़ी यादों को ताज़ा किया उन किताबों और उन किताबों को पढ़ाने वाली टीचर को और उनके लिए रखें गए नामों को याद करके खूब खुश हुए। उसके बाद साइंस की प्रैक्टिकल फाइल भी मिली तो सोचा मां ने कितने संभाल कर इतने सालों तक कितनी हिफाज़त से रखी है। उस पर अपनी सुंदर लिखावट देख कर मन प्रसन्नता से भर गया मानों मैंने लिखने में अक्षर की जगह मोती पिरो दिया हो वहीं अपनी मेहनत से बनाए डायग्राम देख कर खुद को पिकासो से कम नहीं आक रहे थें।
इसी बीच मम्मी का फरमान आता है बहुत सालों से यह कबाड़ इकट्ठा करके रखा है देख लो अगर काम का है तो रखो नहीं तो फेंको अगर किसी और के काम का है तो उसे दे दो अब हमारी भी उम्र हो चली है हम से उठा कर अब और नही रखा जाता कब तक तुम्हारे सामान की हिफाजत करके रखें।
मम्मी ने इस प्रकार खजाने को कबाड़ कहा मेरी मेहनत की पूंजी को इस प्रकार की संज्ञा से मन उदिग्न तो बहुत हुआ अपने जमा पूंजी को देखकर उनकी दी हुई कबाड़ की संज्ञा मन को अधिक उदिग्न नहीं कर पाई।
मैंने मां से बोला जिसे आप कबाड़ कह रही हैं वह मेरी मेहनत की जमा पूंजी याद है कितनी मेहनत से कितनी मशक्कत से मैंने यह फाइल बनाई उसमें कितनी मेहनत से मैंने यह डायग्राम्स बनाएं इसको आपने एक बार में कबाड़ कह दिया माना कि आपने इन फाइल्स को मेरी किताबों को 20 साल तक संभाल कर रखा लगता ही नहीं इतनी पुरानी है कितने सरीखे से करीने से रखा कम से कम  इसको कबाड़ कह कर इसका मोल न कम करिए।
समान की शिनाख्त करते हुए मुझे अपनी पुरानी मित्रों की कुछ पुरानी फोटो मिली जिसे देखकर मन आनायास ही झूम उठा पुराने दोस्तों को देखना और अपनी पुरानी फोटो को देखकर अपने कद काठी को देखकर मन में एक बार तो घमंड आ ही गया था तब कितने भोले सीधे-साधे सच्चे हुआ करते थे छल प्रपंच तो लेश मात्र भी नहीं था। जीवन में अपने आप में कितने परिवर्तन आ जाते हैं।
अब और तब में कितना अंतर है समय और हालात इंसान को कितना बदल देते है या यूं कहे वक्त की दरकार है समय के साथ बदलो और आगे बढ़ो और नहीं तो वही खड़े रहो और लोगों को आगे बढ़ते हुए समय के साथ भागते हुए देखो।
पर जीवन की इस आपाधापी में बहुत कुछ पीछे छूट जाता है और बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है क्योंकि आप साथ ले कर नहीं चल सकते हैं। जो छूट गया और जिसे छोड़ दिया वह जीवन में वापस कभी लौट कर नहीं मिल सकता। पर शायद ये खुशी मुझे मेरी चीजों को देख कर मिल रही थीं। इसी बीच मुझे मेरी स्लैम बुक मिली जो देखते ही मन खुश हो गया। अब आपको लगेगा ये स्लैम बुक क्या बवाल आ गया। अरे साहब ठहरिए घबराइए मत यह स्लैम बुक बस मार्केट के चोचले है वही जो आपके समय में डायरी होती थी जिसमें आप अपने दोस्तों से कुछ यादगार लिखवाते थे उसे ही बाजारीकरण ने स्लैम बुक नाम दे दिया था उस समय।
स्लैम बुक के पन्ने पलटे पहले पेज पर उस समय की बेस्ट फ्रेंड जो हुआ करती थी उस का नाम था उस में उसका एक पासपोर्ट साइज फोटो चस्पा था। उसमें उसका थोड़ा सा इंट्रोडक्शन  दिया था जैसे नाम बर्थ डेट घर का नाम पसंदीदा रंग हीरो हीरोइन खाना जगह वगैरह की जानकारी पूछी जाती फिर उसके दोस्तों की सूची और दो चार सवाल। मुद्दा ये होता था की उस दोस्त की सूची में अपना नाम होना आवश्यक होता था नही तो घनघोर बेइज्जती होती थी की स्लैम बुक तुम्हारी दोस्त भी तुम्हारी और उसकी दोस्त की सूची में ही तुम्हारा नाम नहीं छीं।
इसी तरह के कुछ और सवाल पर एक महत्वपूर्ण सवाल तो बताया ही नहीं वह यह कि आप क्या बनना चाहते हो और यकीन मानिए इस सवाल का जवाब का वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता था। जिसका जो मन आए उस में लिख सकता था क्योंकि न तो उस पर आपसे कोई प्रश्न पूछता न नंबर मिलते जो जिसका मन हो लिख दो भविष्य में कौन आपसे प्रश्न करेगा आपने तो ये लिखा और बने आप ये।
अब स्लैम बुक कम पड़ जाती तो डायरी का सहारा लेना पड़ता क्यों कि दोस्त और दोस्ती दोनो ही ज्यादा थीं अब यहां एक प्रेशर ये भी था कि फला दोस्त ने मुझे स्लैम बुक या डायरी भरवाई तो हमे भी भरवानी पड़ेगी और तो और उसे भरने के लिए घर ले जाते थे सुंदर राइटिंग के साथ साथ अपने राइटिंग स्किल्स का भी उदाहरण जो देना होता था। ये प्रेशर अलग लेवल के थे। यकीन मानिए स्कूल छूटते ही ये कबाड़ी के भाव जाते मेरे पास तो मिल भी गए बीस साल बाद बाकी से पूछेंगे तो उन्हे तो शायद याद भी न हो। अब आपके अंदर सवाल कौंधा होगा ये बीस साल पुराने दोस्त वापस मिले कहा तो ये है न अपना फेस बुक यहां सब पुराने भूले बिछड़े मिल जाते है पर यहां भी एक मुद्दा है की आपका और अपने दोस्त का इगो नही टकराना चाहिए बस नही तो दोस्ती नहीं होती बस चोरी चोरी प्रोफाइल चेक होता और अगर इगो न टकराया तो रिक्वेस्ट सेंड और दोस्ती हो जाती।
अब बात आई ये मेहनत पूंजी या खजाने में खुद को ढूंढने की बात तो उसे खंगालते हुए मुझे मेरी कुछ स्टेज परफॉर्मेंस की फोटो मिली देख कर मन खुश हुआ कितना कॉन्फिडेंस था तब मुझ में अपने स्कूल के सभी प्रोग्राम में एंकरिंग करती थी पर इसको कभी कैरियर बनाने की नहीं सोची। ये एंकरिंग का हुनर भी मेरी स्कूल टीचर ने मुझ में से ढूंढ निकाला और उसे तराशा भी। एक और हुनर था उस टाइम मैं स्कूल की हेड गर्ल हुआ करती थी परेशान मत होइए समझाती हूं हेड गर्ल मतलब प्रेसिडेंट आम भाषा में। इस कारण भी आवाज से  हनकदार चेहरे से कड़क और अनुशासन से भरी हुई हुआ करती थी। स्कूल के बच्चे मेरे क्लास के पास से गुजरने से भी डरते थे मेरे नाम से भी डरते थे और अब घर की छिपकली भी मुझसे न डरे घर के सदस्य तो दूर बच्चे भी नही डरते।
यही सब बदलाव जिंदगी में आए है जो समय के साथ आना लाज़मी थे वरना आज हम इन यादों में खुद को ढूंढ रहे है अगर समय के साथ न चले होते और बढ़े होते तो हम भी कही ना कहीं इन किताबों की तरह बंद कमरे में पड़े होते और हम तो खुद को ढूंढने के बहाने आ भी गए और यहां पर जमी धूल भी साफ कर ली पर मेरे और मेरे वजूद पर जमी धूल कोई साफ करने नही आता समय जब आगे बढ़ जाता तो कोई वापस पलट कर नही देखता इतना किसी के पास समय नहीं है किसी के लिए भी।
इन सब बातों में खोए थे कि तभी घर पर किसी ने वापस टी वी चला दिया और वापस वही कोरोना की खबर कानों में पड़ने लगीं हमने भी तेजी से सब सामान संभालते हुए करीने से अलमारी में वापस लगाया और सब समेट कर बंद करते हुए कुछ गुनगुनाते हुए किचन में चाय बनाने चले गए कान में जरूर आवाजें पड़ रही थी ऑक्सीजन के बिना लोग हस्पताल में मर रहे वही नेता कह रहे ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में है पर मैं शायद अभी भी मन से खज़ाने में खोई हुई हूं दिल कही दिमाग कहीं मैं कही और होंठ कुछ और गुनगुना रहे है।
कुछ भी हो कुछ देर के लिए सही पर इस तनाव भरे नकारात्मक वातावरण से कुछ देर के लिए कही वापस बीस साल पहले खुद की खोज में जो गई थी वह कहीं ना कही मुझे अंदर तक खुशी दे गया। मन में सकारात्मकता के साथ एक खुशी एक उत्साह भी था कुछ शब्दों में बयां करने वाली तो नहीं और मिली जुली भावना है जो बहुत अच्छी है सुख देने वाली हैं।
मैं तो सब से कहूंगी अगर घर के किसी कोने में खुद को तलाशने की जगह हो तो जरूर जाइए वहां आपको अपनी पुरानी डायरी और एल्बम मैं खुद को ढूंढने और वापस पाने का एक दोहरा जो एहसास या यूं कहे खुशी मिलेगी वह हर चीज से बड़ी होगी यकीन मानिए कुछ घंटों तक आप उसी में खोई हुई रहेंगी और रहना भी चाहेंगी।
यह कोरोना और उसकी खबरें तो आती जाती रहेंगी पर खुद को ढूंढने और उसमें वापस जो जीने का मजा है वह अप्रतिम हैं

डॉ सोनिका शर्मा

Sunday, May 2, 2021

जंग लड़ता आदमी

 

सड़कें हैं शांत
मगर चीखती है अस्पताल की दीवार
इंसान है परेशान
मगर समझ के है सब बाहर
चारों तरफ है दर्द का सैलाब
इंसान इंसान से है डरता
मदद तो दूर
सामने से आता देख रास्ता बदलता
अपने और अपनों की परवाह
सिर्फ अपना और अपनों की सोचता
जिंदगी भर जिस पैसों के लिए भागा
आज वह भी नही आ रहा इंसान के काम
डरा सहमा हताश चारों ओर घूमता आदमी
अपने और अपनों को बचाने की जंग लड़ता हुआ आदमी।।


डॉ सोनिका शर्मा


Wednesday, April 21, 2021

विचार

 

मेरा शहर थक गया उसका हौसला भी टूट रहा है हिम्मत भी हार रहा है पर यकीन रखिए फिर उठेगा यह काले बादल छंट जाएंगे फिर सुबह का सूरज उगेगा फिर हम सब ताज़ी हवा में सांस लेंगे बस हौसला रखना है। इंतजार करना है नई सुबह का उस सुबह का जब हम खुल कर खुली हवा में सांस लेंगे उस दिन का जब हम हाथ मिलाने और गले लगाने से नहीं डरेंगे।
फिर वह दिन आयेंगे जब सब के सुख दुःख साथ मिल कर बाटेंगे खुशी हो या गम सब इकट्ठे होंगे। बस थोड़ा सा धैर्य थोड़ी सी समझदारी थोड़ा सा आत्मविश्वास रखना अपना और अपने अपनों का ख्याल रखना हैं और सकारात्मक सोच के साथ अपने आस पास सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है।
अभी के लिए सिर्फ ईश्वर पर विश्वास और सकारात्मक सोच के साथ अपने प्रति जागरूक रहिए।

डॉ सोनिका शर्मा


Monday, April 5, 2021

जेंडर इक्वालिटी

 

जेंडर इक्वालिटी की बात तो करते
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

किचन में जाते समय मां ने बेटी से
नहीं बेटे से कहा हो
चल बेटा आज तू मेरे साथ लग कर खाना लगवा दे न
क्या कभी यूं भी हुआ हो जब
किसी के आने पर मां ने बेटी की जगह बेटे से कहा हो चाय बनाने को।।

जेंडर इक्वालिटी की बात तो करते है
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

बचपन में कभी पापा ने अपने बेटे की जगह बेटी को
सिलेंडर उठाने के लिए बुलाया है
कभी यूं भी हुआ हो पापा ने किसी इमरजेंसी पर बेटे की जगह बेटी को बुलाया हो।।

जेंडर इक्वालिटी की बात तो करते है
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

कभी यूं भी हुआ हो जब बाबा – दादी को पोते से ज्यादा पोती पर नाज हुआ हो
ऐसा भी कभी हुआ हो जब बाबा – दादी कहे मेरी तो पोती मेरा नाम रोशन करेगी।।

जेंडर इक्वालिटी की बात तो करते हो
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

औरत पूरा जीवन संघर्ष करती है
फिर भी कोमल कहा जाता है
शारीरिक बदवालों के साथ रोज खुद को संभालते हुए संघर्ष
फिर भी कमज़ोर कहा जाता।।

जेंडर इक्वालिटी की बात तो करते हो
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

ईश्वर ने भी भेदभाव ही किया औरत के साथ
शारीरिक संरचना हो या बच्चा पैदा करना
यह काम सिर्फ औरत को दिया पुरुष को नही
फिर भी समाज अबला कहता है।।

जेंडर इक्वालिटी की बात करते हो
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत

संघर्षों भरे जीवन के बाद
घर को संभालना उसे घर बनाना
ये भी एक औरत ही करती है
कभी किसी ने पुरुष से अपेक्षा की है क्या?

जेंडर इक्वालिटी की बात करते हो
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत।

डॉ सोनिका शर्मा




शादी के बाद कभी ऐसा हुआ है
जब ऑफिस से थकी घर लौटी हो
और सास ने बहू की जगह बेटे से कोई काम की उम्मीद की हो
पूरी जिंदगी भेदभाव ही होता आया
और फिर भी जेंडर इक्वालिटी की बात हम करते हैं
कभी जिंदगी में इक्वल हुई है औरत।।


Friday, March 19, 2021

बदलते रिश्ते

 

अंशुला और अर्जुन कभी साथ थे दोनों एक दूसरे को नापसंद करते हुए दोस्त बने फिर उनकी दोस्ती धीरे –धीरे शादी तक पहुंच गई मैंने बीच में प्यार का नाम नहीं लिया क्योंकि यह बता पाना थोड़ा मुश्किल हैं कि दोनों में प्यार था कि नहीं पर दोनों ने शादी जरूर की थीं क्यों की थीं? कारण नहीं मालूम पर वह शादी साल भर भी नहीं चल पाई थीं। उनकी शादी क्यों टूट गई उसका कुछ खास कारण तो नहीं पता पर दोनों को ही एक दूसरे के साथ तब नहीं रहना था।
दोनों के साथ न रहने के कारण भी कई थे अर्जुन को लगता था अंशुला बहुत मैच्योर सी बेहवे करती हैं लाइफ को बहुत सीरियसली लेती है और जीती हैं। कुछ नया करने में कतराती हैं यहां तक कि कुछ नया सोचने से भी दूर भागती है। अर्जुन अंशुला से बिल्कुल विपरीत था लाइफ को शायद ही अब तक अर्जुन ने कभी सीरियस लिया हो। अर्जुन आज में जीना पसंद करता था लाइफ में नए नए एक्सपेरिमेंट करना उसे पसंद था फिर चाहे खाना हो, या कपड़े हो, घूमना हो, या फिर जॉब। सब जगह कोई न कोई नया एक्सपेरिमेंट करने में मस्त रहता था। अर्जुन का मानना था लाइफ सबको एक बार मिलती है उसे खुल कर अपने हिसाब से मस्त हो कर जीना चाहिए ना कि एक स्टीरियोटाइप तरीके से। लाइफ को एक्साइटेड बनाना चाहिए कुछ नया करके।
दोनों के सोच व्यवहार विचार खान पान सब बिल्कुल अलग थे। अंशुला शुद्ध शाकाहारी तो अर्जुन मांसाहारी। अंशुला शांत सौम्य सीधी सच्ची अपने वैल्यूज के साथ जीने वाली तो वहीं अर्जुन का लाइफ मैं कोई वैल्यूज नहीं थे फॉलो करने के लिए उसे जैसा मन करता जो मन करता वह करता था। अर्जुन तो झूठ इतनी सफाई और सच्चाई से बोलता कि उसे कोई जल्दी पकड़ ही नहीं सकता था। अर्जुन खुद भी कहता था सच के पास फटकता नहीं में झूठ को अपने से दूर जाने नहीं देता। अर्जुन का मानना था कि यहीं उसकी लाइफ हैं और वह इसी लाइफ के लिए बना है और खुश भी बहुत है इस लाइफ से।
कहीं न कहीं यहीं दोनों को एक दूसरे से अलग करने का कारण बन गया था। दोनों ने अपने रिश्ते को अपनी शादी को बचाने की बहुत कोशिश की पर बहुत सारे ऐसे कारण थे जिससे वह अपनी  शादी को नहीं बचा पाए। शादी के टूटने के बाद भी दोनों एक दूसरे के दोस्त थे वीकेंडस में मिलना बातें करना अपनी प्रॉब्लम एक दूसरे के साथ शेयर करना डिस्कस करना यह सब उनका अभी भी था उनका मानना यह था कि शादी हमारी सक्सेसफुल नहीं रही तो क्या हुआ दोस्त हम अच्छे रहे थे और आगे भी रह सकते हैं।
अंशुला और अर्जुन की शादी टूटने में भी अर्जुन का ही हाथ था क्योंकि अर्जुन अंशुला के साथ बिल्कुल भी एडजस्ट नहीं कर पा रहा था वहीं दूसरी तरफ अंशुला लाख कोशिश कर रही थी कि उसकी शादी ना टूटे पर अर्जुन का मानना था कि जिस रिश्ते में कंपैटिबिलिटी ना हो उस रिश्ते को निभाने का कोई मतलब नहीं इस रिश्ते को हम एक दूसरे पर थोप रहे हैं या यूं कहें इस रिश्ते को ढो रहे हैं। अर्जुन और अंशुला अपनी शादी की सालगिरह तो नहीं मना पाए पर अर्जुन अपने शादी टूटने को जरूर सेलिब्रेट करता था जिसकी वजह से अंशुला कहीं ना कहीं हर्ट तो होती थी पर उसका एहसास वह अर्जुन को कभी नहीं होने देती थी उन दोनों की शादी को टूटे हुए भी दो साल होने को आए थे।
इसी बीच अंशुला की जिंदगी में राहुल नाम का एक लड़का आता है और जैसा कि अंशुला और अर्जुन दोनों ही एक दूसरे से सब कुछ शेयर करते हैं और डिस्कस करते हैं अंशुला ने अर्जुन से राहुल के बारे में भी डिस्कस किया। जिसके बारे में सुनने के बाद अर्जुन को थोड़ा बुरा लगा अर्जुन को यह लगने लगा कि अब अंशुला मूव ऑन कर रही है अब शायद आगे वह दोनों अच्छे दोस्त भी ना रह पाए। अर्जुन यह जानते हुए कि राहुल एक अच्छा लड़का हैं और अंशुला के लिए सूटेबल भी है पर फिर भी वह अंशुला को राहुल का डार्क साइड ही दिखाता पर अर्जुन के सारे जतन करने के बाद और उसके न चाहते हुए भी अंशुला और राहुल करीब आ रहे थे।
वहीं दूसरी ओर राहुल को अर्जुन और अंशुला के रिश्ते से ऐसी खास कोई दिक्कत नही थी पर वह कही न कहीं यह जानता था कि अर्जुन उसे बहुत पसंद नहीं करता हैं। एक साधारण आदमी की तरह अर्जुन और अंशुला की दोस्ती पर कभी कभी राहुल को खराब भी लगता पर वह अंशुला पर पूरा विश्वास करता और उसकी खुशी के लिए कभी कुछ नहीं कहता।
इसी बीच अंशुला और राहुल शादी का फैसला करते है क्योंकि वह दोनों एक दूसरे के साथ कंपेटिबल थे और दोनो एक दूसरे के साथ रहना चाहते थे। यह बात सुन कर अर्जुन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता इसका कारण यह भी था कि आज भी अर्जुन अंशुला पर अपना अधिकार समझता था या अब उसे अपनी दोस्ती खतरे में दिखाई देने लगी थीं।
अंशुला और राहुल की शादी की बात चीत के दौरान अचानक अर्जुन को अंशुला के लिए प्यार जाग जाता है और वह वापस अंशुला से शादी का प्रपोजल रखता है और अपने को बदलने की बात भी करता है जिसे सुन कर अंशुला उसे साफ शब्दों में मना कर देती है और समझाती है कि अगर यह शादी चलनी होती तो तभी चल जाती और अगर तुम्हे बदलना होता तो तब ही बदल जाते और आज भी तुम इनसिक्योर हो कि मेरी शादी राहुल से हो रही है तो सब बदल जाएगा इस लिए यह डिसीजन ले रहे हो पर अर्जुन हम पहले की तरह अभी भी अच्छे दोस्त रहेंगे तुम ऐसा क्यों सोचते हो। अर्जुन को अपनी सोच पर कोई रिग्रेट नही था वह तो सिर्फ और सिर्फ अंशुला को हासिल करना चाहता था क्योंकि उसे लगता था की राहुल उससे अंशुला को दूर ले जाएगा।
अर्जुन के प्रपोजल से अंशुला कहीं न कही परेशान थी और चाह कर राहुल से नहीं कह सकती थी क्योंकि राहुल इस बात को अलग नजरिए से देखेगा। वही अंशुला की राहुल के साथ सगाई हो जाती है और इस बात से अर्जुन अंशुला से चिढ़ने लगता है इसी के बाद करीब आठ महीने बाद अंशुला और राहुल की शादी फाइनल होती है इस खबर को अर्जुन नही झेल पाता और आनन फानन में वह अर्जुन अंशुला को दिखाने के लिए अपनी ऑफिस कॉलीग से शादी का फैसला लेता हैं। जिसे सुन कर अंशुला सोच में पड़ जाती है कि कैसे अर्जुन अपनी ही लाइफ से खेल रहा है सिर्फ मुझे और राहुल को नीचा दिखाने के लिए।
इधर राहुल से शादी तय होने के बाद अर्जुन अंशुला में दूरी आ गई थी अब अर्जुन न तो अंशुला से मिलता और न कुछ शेयर करता फिर भी अंशुला ने अर्जुन को समझाने के लिए अर्जुन को मिलने बुलाती है पर अर्जुन नही आता और टाल जाता है और दुबारा आता है तो अपनी गर्लफ्रेंड को साथ लाता है इस कारण अंशुला कुछ बात नही कर पाती अर्जुन से।
एक दिन अंशुला को अर्जुन से बात करने का मौका मिलता है और अर्जुन को अंशुला समझाते हुए कहती है कि लाइफ का कोई भी फैसला जल्दबाजी में मत लेना सोच समझ कर लेना जिस पर अर्जुन खीझ कर कहता है तुम मुझसे चिढ़ती हो जलती हो मेरी खुशी में खुश नहीं हो। इन बातों को सुन कर अंशुला काफी दुखी होती है और फिर दुबारा अर्जुन से न मिलने का फैसला लेती है। राहुल और अंशुला की शादी से पहले अर्जुन शादी कर लेता है और राहुल और अंशुला को शादी में भी नही बुलाता है जिससे अंशुला दुखी तो होती है पर अपने को समझा लेती है पर अपनी शादी मैं अंशुला अर्जुन को बुलाती है और अर्जुन जाता भी हैं।
अब अंशुला राहुल की शादी हो चुकी और दोनो अपनी जिंदगी में खुश भी है पर वहीं अर्जुन और उसकी गर्लफ्रेंड(पत्नी) का डाइवोर्स फाइल हुआ है और उसने अलमनी में करोड़ों रुपए मांग किए है और अर्जुन पूरी तरह से सड़क पर आ चुका है क्योंकि उसके पास अलमनी देने के बाद कुछ नही बचता।


Saturday, March 6, 2021

मन की गिरहे

 सुनो

ऐ स्त्री

कब खोलोगी 

अपने मन के अंदर की गिरहे

कब तक बंद रखोगी 

अपने भीतर उसे।


कब हल्का करोगी

अपने मन को भीतर तक

कब तक बंद रखोगी

अपने भीतर उसे।


माना की तुमने बहुत कुछ झेला

माना की तुमने बहुत कुछ देखा

पर अब बहुत हुआ

खोल दो उन गांठों को

हटा दो उन परतों को

कब तक बंद रखोगी

अपने भीतर उसे।


मकान को घर बनाया

परायों को अपना बनाया

अपने सपनों को भुलाया

अपनी इच्छा को कुचला

अब तो दिल को खोल दो

बह जाने दो उस सागर को

कब तक बंद रखोगी

अपने भीतर उसे।


कभी घर के लिए 

कभी बच्चो के लिए

कभी उनके लिए

खुद को रोका 

खुद को टोका

पर अब सब भुला कर

एक बार अपने लिए 

खोल दो मन को

कब तक बंद रखोगी

अपने भीतर उसे।


सुनो

ऐ स्त्री

कब खोलोगी 

अपने मन के अंदर की गिरहे

कब तक बंद रखोगी 

अपने भीतर उसे।।


डॉ सोनिका शर्मा

शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस की सभी को अनंत शुभकामनाएं आप सबके जीवन की पहली शिक्षिका तो माँ हैं पर दूसरी शिक्षिका या शिक्षक स्वयं जिंदगी है बहुत कुछ सिखाती ...