Thursday, July 31, 2025

दिल की आवाज

                                 (1)


मालूम है इन बारिश की बूंदों ने भी बेइंतेहा मुहब्बत की होगी कभी।

तभी तो ज़मीन से मिलने के लिए इतना नीचे गिरना पड़ता है इन्हें भी।।

   

                                   (2) 


होना तो बहुत कुछ नहीं चाहिए था,

करना तो बहुत कुछ नहीं चाहिए था।

पर सब होता चला गया,

वक़्त मेरे साथ और मैं वक़्त के साथ उलझती चला गया।।


                                   (3)

 

तुम वह वक्त थे जिसे मैं रोक नहीं पाईं,

मैं वह पल थीं जिसे तुम थाम नहीं पाये।



                                  (4)


अब छोड़ो तुझमें वह बात नहीं है,

इसीलिए तेरी आरजू साथ नहीं हैं।

बहुत रो चुके हैं तुम्हारे लिए,

अब मुस्कुराना है अपने लिए।।



                                 (5)


अंधेरी रातों में बहुत जाग चुके हैं हम,

तेरे पीछे बहुत भाग चुके हैं हम।

तुझसे जुड़ी हर याद को भुला रहे है हम,

जा अब तुझे से दूर जा रहे हैं हम।।



                                 (6)


हम उनसे हर लम्हें में मुहब्बत करते रहे,

वह हमसे हर लम्हें में नफ़रत करते रहे।

हमने हर दुआ में उन्हें मांगा था,

उन्होंने हर दुआ में किसी और को मांगा था।

हमारी दुआएं उनकी सलामती की थीं,

उनकी दुआएं अपनी खुशी की थीं।

हर पल नज़रे उन्हें देखना चाहतीं हैं,

उनकी नज़रों किसी और को चाहतीं हैं।

यह इश्क़ भी कमबख्त मेरा ऐसा है,

जिसे हम चाहते है वह किसी और का है।।

Wednesday, July 30, 2025

बहन या सखी

 "अमोली तुम कितना टाइम लेती हो।" घर में अगर दो बाथरूम न हो तो मैं रोज़ ऑफिस के लिए लेट हो जाऊं। रिचा की आवाज़ किचन से बाथरूम तक गूँज रहीं थीं। रिचा अमोली के ऊपर बड़बड़ाती जा रही थी और साथ ही ऑफिस के लिए तैयार हो रही थीं। तभी बाथरूम में से पानी गिरने की आवाज़ बंद हो जाती हैं, अमोली बाथरूम से निकलती है और गीले बालों को तौलिया से सुखाते हुए कहती हैं क्यों सुबह -सुबह अपना बी पी बढ़ाती हो, कहकर जल्दी से तैयार होने लगती हैं और साथ दीदी को बोलती है आज तो लेट हो जाऊँगी कॉलेज पहुंचने में। यह कहकर जल्दबाजी में अमोली गीली तौलिया बिस्तर पर डाल फटाफट तैयार होती है तभी बिस्तर पर गीला तौलिया पड़ा देखा रिचा अमोली पर फिर बड़बड़ाती है। अमोली तेरा रोज़ का है देर से सो कर उठती है फिर भागम भाग में कॉलेज के लिए तैयार होना और चीज़े इधर उधर फेंकना और तौलिया तो रोज़ बिस्तर पर ही डालती है और रोज़ उसके लिए मैं तुझे टोकती हूं पर तुम पर तो कोई असर ही नहीं पड़ता मेरी बातों का।

अमोली फिर भी बातों को अनसुना करते हुए बैग उठाती हैं,  जूते पहनकर, टेबल से सैंडविच हाथ में लेकर कहती है दीदी कोई नहीं इन बातों को शाम को डिस्कस करते है अभी लेट हो गया शाम को डांट लेना और बाय बोल वह कॉलेज के लिए निकल जाती है। 

दरवाज़ा तेज़ी से बंद हुआ और रिचा वहीं खड़ी रह गई—हाथ में तौलिया लिए, माथे पर शिकन लिए। उसने गहरी साँस ली और मन ही मन बुदबुदाई- इसकी रोज की यही आदत है। मैं रोज ही बोलती हूँ और गलती से भी इस लड़की पर कोई असर नहीं पड़ता।

शाम के करीब 7 बज रहे थे। रिचा ऑफिस से लौटते ही सीधे किचन में घुस गई। आदतन उसने पर्स टेबल पर रखा, और फ्रिज से पानी निकालकर गिलास में पानी लिया। घड़ी की ओर देखा अभी तक अमोली घर नहीं आयीं थी।

आज फिर देर कर दी इस …” वह मन में बुदबुदाई।

लेकिन इस बार उस बुदबुदाहट में गुस्सा नहीं था, बस एक चिंता थी, जो अब अक्सर होने लगी थी। कुछ देर बाद ही दरवाज़े की घंटी बजी रिचा तेज़ी से दरवाज़े की ओर जाती हैं और दरवाज़ा खोलती हैं और तभी अमोली हल्की-सी साँस छोड़ते हुए घर के अंदर दाखिल होती। उसका चेहरा थका हुआ था, आँखों के नीचे हलके-काले घेरे और कंधे पर ढीला पड़ा बैग जैसे कह रहा हो –"आज का दिन भारी था।"

रिचा कहती हैं घड़ी देखा, "आज भी 7 के ऊपर हो रहा हैं।"

रिचा की आवाज़ तेज़ तो नहीं थी, पर सीधी और सख़्त जरूर थीं।

अमोली ने बस हल्के से सिर हिलाया, जैसे कह रही हो – “हाँ, मालूम है।”

वह बिना कुछ बोले सीधे अपने कमरे में चली गई। रिचा कुछ पल के लिए रुकी और फिर उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में गई। कमरे में अमोली ज़मीन पर बैठी थी, जूते उतार रही थी और चुपचाप नीचे देख रही थी।

रिचा ने अमोली से पूछा  "क्या हुआ?"

रिचा का स्वर अब कुछ मुलायम हो गया।

अमोली ने नजरें उठाईं। कुछ देर चुप रही। फिर बोली,

"आज क्लास के बाद लाइब्रेरी में रुक गई थी। असाइनमेंट सबमिट करना था। लेकिन… वहाँ इतनी भीड़ थी… फिर लैपटॉप भी हैंग हो गया, और जब सब फॉर्म भर चुके थे, मेरा पेज लोड ही नहीं हुआ। फिर… फिर थोड़ी देर रुक गयी ।"

रिचा के चेहरे पर हैरानी आई, फिर बेचैनी से फिर क्या अमोली। रिचा पास आकर बैठ गई। अमोली फिर क्या थोड़ा वेट किया थोड़ी देर बाद फॉर्म जमा हो गया। फिर अचानक अमोली के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"पर दीदी, शाम की डांट का क्या हुआ?"

रिचा हँस पड़ी, धीरे से उसका सिर सहलाया।

"रोज़ की डांट तो चलती रहेगी, पर.... अमोली बोली पर जब मैं इस तरह थकी हुई लौटकर आऊँ, तो बस खाना मिलना चाहिए और कोई सिर सहलाने वाला होना चाहिए… है न?"

अमोली ने चुपचाप अपना सिर दीदी की गोद में रख दिया।

रात को जब दोनों खाना खा रही थीं, अमोली बोली-

"तौलिया कल से बिस्तर पर नहीं फेंकूंगी।"

रिचा ने बिना देखे जवाब दिया, "और मैं तुम्हें रोज़ की तरह डांटना नहीं भूलूंगी।" दोनों हँस पड़ीं।

बहनों का यही तो रिश्ता होता है।

अगली सुबह।

रिचा बिस्तर से उठी, तो देखा- तौलिया इस बार बिस्तर पर नहीं था। वो मुस्कुराई, जैसे कोई छोटा सा वादा निभा लिया गया हो पर अगले ही पल उसका ध्यान गया- अमोली आज अभी तक नहीं उठी थी। घड़ी में 7:15 बज रहा था।

"अमोली - रिचा ने आवाज़ लगायी। कोई जवाब नहीं"।

वो चिंतित होकर अंदर गई- अमोली बिस्तर पर बैठी थी, घुटनों में सिर छिपाए कमरा अंधेरे में था, पर्दे बंद। अलार्म बजा, लेकिन उसने बंद भी नहीं किया।

रिचा धीरे से पास गई। "क्या हुआ?"

अमोली ने सिर उठाया उसकी आँखें लाल थीं। चेहरा उतरा हुआ, बाल बिखरे और होंठ सूखे।

"मैं नहीं जाना चाहती आज कॉलेज," वह बोली।

"क्यों?" रिचा ने पूछा 

"बस… मन नहीं कर रहा। कुछ दिन से मन बिल्कुल शांत नहीं है। लगता है कुछ ठीक नहीं चल रहा… पढ़ाई में मन नहीं लगता… प्रोफेसर की बातें सिर के ऊपर से जाती हैं… और हर चीज़ जैसे बोझ लगती है।"

रिचा ठिठक गई।

उसने पहली बार अमोली को इतने टूटे हुए अंदाज़ में देखा था।

"किसी से कोई बात तो नहीं हुई ?"

"नहीं… किसी से नहीं? 

बस सब तो कहते हैं 'बड़ी हो गई हो', 'स्ट्रॉन्ग बनो'… और तुम भी तो दीदी, रोज़ कहती हो — 'सुनना छोड़ो, करना सीखो'।"

रिचा कुछ पल चुप रही।

फिर धीरे से बोली, "मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरी डांट भी कभी तुम्हारी चुप्पी बन सकती है।"

वह अमोली के पास बैठ गई, उसके कंधे पर हाथ रखा।

"अमोली, स्ट्रॉन्ग होने का मतलब ये नहीं कि सबकुछ सहो और चुप रहो। कभी-कभी टूट जाना भी ज़रूरी होता है। मैं हमेशा तुम्हारी बड़ी बहन रही, लेकिन शायद तुम्हारी दोस्त बनने में पीछे रह गई।" रिचा की आंखों से आँसू बह निकले जिसे देख अमोली की आँखों में आँसू आ गए। 

अमोली कहती है  "कभी-कभी लगता है… जैसे मैं कहीं जा ही नहीं रही। मैं बहुत कोशिश करती हूँ दीदी, लेकिन… शायद मैं उतनी अच्छी नहीं हूँ, जितना सब सोचते हैं।"

रिचा ने उसे कस कर गले से लगा लिया।

"तुम जैसी हो, वैसी ही बहुत अच्छी हो। तुम्हें साबित करने की ज़रूरत किसी को भी नहीं। बस खुद को थामे रखना सीखो… और जब थामना मुश्किल हो, तो याद रखना - मैं हूँ।"

उस कमरे में कुछ देर तक बस सिसकियों और खामोशियों की भाषा बोली जाती रही।

उसी शाम, रिचा ने अमोली के लिए एक कॉफी बनाई और उसकी किताबें खुद सहेज कर रखीं।

और अमोली ने पहली बार रिचा को ‘दीदी’ की बजाय ‘सखी’ कहा।

Monday, July 28, 2025

विश्वास की डोर

 जयश्री एक म्यूजिक टीचर थी। चेहरा शांत, व्यवहार सौम्य, सीधी सरल अपने स्कूल स्टाफ के बीच बेहद पसंद की जाने वाली - कभी किसी से बहस नहीं, हमेशा मदद को तैयार रहने वाली टीचर थीं पर यह कोई नहीं जानता था कि उसकी अपनी जिंदगी में असल में वह कैसी है और उसकी जिंदगी में क्या चल रहा हैं।

इसी जयश्री के पति दीपक ने सात साल पहले, अचानक से कहा था जयश्री "मुझे लगने लगा है कि मैं अब तुम्हें नहीं समझ पाता… शायद कभी समझा ही नहीं पाया।"

यह बात जयश्री को किसी तलवार की तरह उसके भीतर धँस गई थी।

दीपक चला गया। उसकी जिंदगी से… बिना झगड़े, बिना अल्फ़ाज़ के और अपने साथ ले गया उसका विश्वास- खुद पर, रिश्तों पर, दुनिया पर।

जयश्री ने किसी से कुछ नहीं कहा। न माता-पिता से,न रिश्तेदारों से और न ही समाज से।

“अकेली हूँ” यह स्वीकार करना उसे अपनी कमजोरी लगती थी। उसने बस इतना कहा था दीपक का विदेश गये कुछ समय के लिए।” सबने मान लिया। पर हर बार वो किसी बंद दरवाज़े को देखती रही जिसे उसने खुद ही बंद किया था क्योंकि अब उसे किसी पर विश्वास नहीं रहा।

इसी बीच एक दिन स्कूल में एक नए हिंदी टीचर की नियुक्ति हुई- राघव। उम्र में थोड़ा छोटा, पर नज़रों में गहराई थी। वह सभी से बोलता था, व्यवहार से सरल, किन्तु वाचाल था सभी से घुलने मिलने वाला जल्दी ही उसने स्कूल के सभी टीचरों के मन में जगह बना ली थीं। धीरे-धीरे बातचीत उसकी जयश्री से भी होती लेकिन जयश्री ने अपने चारो ओर एक दीवार बना रखी थीं इस बातको राघव समझता था पर कभी जयश्री से कहा नहीं।

एक दिन उसने जयश्री से  हिम्मत करके कहा- “आपकी आंखों में कुछ अधूरी कहानियाँ हैं।” जयश्री चौंकी। उसे पहली बार किसी ने इतने ध्यान से देखा था,

जैसे उसने चेहरे के पीछे की सच्चाई पढ़ ली हो। जयश्री को ठीक नहीं लगी राघव की बात क्योंकि उसने उसे इतना गहराई से उसे देखने और ऐसे बोलने की छूट नहीं दी थीं।

उस दिन जयश्री बिना कुछ बोले वहाँ से चली गई। कुछ समय बाद राघव ने फिर जयश्री से बातें शुरू की अब वह रोज़ थोड़ी-थोड़ी बातें करता- कभी कविता की, कभी मौसम की।

पर अब कहीं न कहीं उसके शब्द जयश्री के भीतर कहीं गूंजने लगे थे। जयश्री समझ नहीं पा रहीं थी। वह तो अपने चारों ओर एक रेखा खींच चुकी थी और विश्वास किसी पर करना तो सवाल ही नहीं था।

एक शाम राघव का फोन आया स्कूल के कुछ काम के सिलसिले में इधर उधर की बात के बाद राघव ने कहा,

“क्या मैं आपको एक बात कहूं, बुरा मत मानिएगा…

जयश्री थोड़ा संजीदा हो गई अब तक उसकी आवाज़ भी बदल गई जब वह कुछ बोल पाती तब तक राघव ने बोल दिया- मुझे लगता है आप किसी टूटे विश्वास से भाग रही हैं।”

जयश्री को लगा जैसे किसी ने नब्ज़ पकड़ ली हो। उसने हडबडाते हुए कहा राघव आपको ऐसा क्यों लगता हैं और उसने बात को वही खत्म करते हुए फोन काटने की कोशिश की पर राघव फिर बोला क्यों भाग रहीं हैं खुद से, और कहां भाग रही है और कबतक भागेंगी। कभी न कभी खुद पर और किसी और पर विश्वास तो करना पड़ेगा न जयश्री थोड़ा ठिठक गई अब तक वह कमजोर पड़ने लगी पहली बार किसी ने उसे पढ़ा था।जयश्री ने गहरी सांस ली और बस इतना कहा, “विश्वास… वो शब्द है जो एक बार चला जाए, तो लौटकर नहीं आता।” राघव चुप हो गया।

जयश्री ने राघव से कहा अब रखतीं हूँ और फोन काट दिया।

रात को जयश्री ने दीपक के पुराने मैसेज पढ़े।

कोई पछतावा नहीं था उसमें, कोई वापसी की चाह नहीं। वापस फोन रख दिया कुछ देर सोचने के बाद उसने 

फिर मोबाइल उठाया और राघव को सिर्फ एक पंक्ति भेजी:

“क्या हम सिर्फ बात कर सकते हैं… बिना कोई रिश्ता बनाए, बिना भरोसे की शर्त रखे?”

फोन स्क्रीन देर तक जलती रही… उधर से कोई जवाब नहीं आया। काफी देर इंतजार के बाद जब जवाब नहीं आया तो अनगिनत सवालों से उलझती हुई जयश्री कब सो गई पता न चला।

अगली सुबह उसकी आंख देर से खुली। रात नींद देर से आई थी पर आंखें भारी नहीं थीं। उसका फोन तकिए के नीचे था।

उसने डरते हुए स्क्रीन देखा —

राघव का जवाब आया था:

“बिलकुल।

हम शब्दों से शुरुआत करेंगे।

बिना किसी वादे, बिना किसी मांग के।”

जयश्री कुछ पल स्क्रीन देखती रही।फिर मुस्कुराई बहुत हल्की सी। शायद महीनों बाद।

आज बहुत देर हो गई थी इसलिए जयश्री जल्दी - जल्दी स्कूल समय से पहुंचने के लिए प्रयासरत हो गई।

स्कूल में राघव रोज की तरह स्टाफ रूम में पहले से मौजूद था। जयश्री आई - आँखों में हल्की चमक थी।

राघव ने देखा, मुस्कुराया, और गुडमॉर्निंग बोलकर अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बाद राघव एक चाय का कप उसकी ओर बढ़ाता है- “चीनी कम, अदरक ज़्यादा, जैसी आपको पसंद है।” जयश्री चौंकी।  “तुमने कैसे जाना?”

राघव बोला  “शब्दों से नहीं, नजरों से जाना।” यह कह राघव हँसने लगा इस बार जयश्री भी हँसी - पर इस बार यह हँसी बाहर से नहीं, भीतर से आई थी।

दिन गुज़रते गए दोनों अच्छे दोस्त बन चुके थे अब 

हर दिन एक छोटी-सी बात- मौसम पर, किताबों पर, पुराने गानों पर।

कभी किसी ने अतीत नहीं खोला, न राघव ने पूछा, न जयश्री ने बताया।

बस एक अनकहा समझौता था —

“हम साथ हैं, पर किसी ‘नाम’ के बंधन में नहीं।

पर हर शाम, जब जयश्री घर लौटती, एक सवाल उसके भीतर गूंजता “क्या मैं दोबारा विश्वास कर सकती हूं?”

“या यह भी बस एक और धोखा होगा?”

फिर वह खुद से कहती- “नहीं, ये रिश्ता कोई मांग नहीं रहा।

यह बस साथ चल रहा है - जैसे नदी के साथ बहती हवा।”

अचानक एक दिन, राघव ने स्कूल से छुट्टी ली और कोई खबर नहीं दी। जयश्री थोड़ा परेशान हुई कि कहीं कुछ हुआ तो नहीं? दिन भर इंतजार के बाद बहुत हिम्मत करके उसने खुद पहल की पहली बार-

“आज तुम्हारी चाय छूट गई… उम्मीद है सब ठीक है।”

कुछ ही देर में जवाब आया “सब ठीक है। कल डबल चाय पिया जाएगा।” उसी रात जयश्री ने अपनी डायरी खोली।

बहुत दिनों बाद उसमें लिखा:

“शायद भरोसा कोई चीज़ नहीं होती जिसे हम किसी को ‘दे’ दें, वह तो बस उगता है धीरे-धीरे - जैसे सुबह की धूप उगती हैं।” हाँ पर विश्वास को खोते देर नहीं लगती।

अगली सुबह स्कूल जाते वक्त जयश्री ने मोबाइल उठाया।

उसका ध्यान व्हाट्सएप पर एक नए नंबर से आए मैसेज पर गया।

"जयश्री, मैं दीपक हूँ।

अगर बात करने का मन हो… तो मैं सुनना चाहता हूँ।

सिर्फ एक बार।" उसके हाथ ठिठक गए। दीपक इतने दिनों बाद! जिसने एक दिन कहा था, “मैं अब नहीं समझ पाता तुम्हें,” और बिना कुछ बोले चला गया था आज कह रहा हैं- “मैं सुनना चाहता हूँ।”

आज पूरे दिन जयश्री के मन में उथल-पुथल रही पूरे दिन वह खुद से लड़ती रही। “क्या मुझे जवाब देना चाहिए?”

“क्या ये अंत है?” “या एक और घाव खुल जाएगा?”

राघव स्टाफ रूम में क्लास ले कर वापस आया।

उसने जयश्री की आँखों में बेचैनी देखी,

जिसे वो अब बहुत अच्छे से पहचानने लगा था।

उसने जयश्री से पूछा “सब ठीक है?” जयश्री का जवाब आया 

“शायद नहीं… दीपक ने  इतने सालों बाद आज अचानक मैसेज किया है।”

राघव कुछ नहीं बोला वह अब तक समझ चुका था कि दीपक कौन हैं? सिर्फ इतना कहा -“अगर तुम बात करना चाहो, तो मैं साथ रहूंगा।

पर ये निर्णय तुम्हारा है — सिर्फ तुम्हारा।” स्कूल से छुट्टी के बाद शाम को, बहुत देर तक छत पर बैठने के बाद,

जयश्री ने दीपक को कॉल किया। फोन उठते ही वह बोली 

“क्या सुनना चाहते हो, दीपक?

मेरी चुप्पी की व्याख्या? या तुम्हारे ‘समझ ना पाने’ की माफ़ी?”

दीपक हिचका क्योंकि अब तक जयश्री की यह आवाज यह तरीका उसके लिए नया था 

दीपक ने कहा- “नहीं… मैं बस कहना चाहता हूँ कि मैंने उस वक्त बहुत कुछ नहीं देखा… और तुमने कुछ कहने नहीं दिया।”

जयश्री की आँखें भर आईं, पर आवाज़ सख्त रही —

“हाँ, मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि तब मेरा हर शब्द —

तुम्हारे ‘विश्वास’ से छोटा था।”

“अब कुछ कहना नहीं चाहती हूं। " "न ही कुछ सुनना चाहती हूँ।'"

अब सिर्फ खुद को सुनना चाहती हूँ।

और जानती हूँ। अब मुझे तुम्हारी ‘माफी’ की ज़रूरत भी नहीं हैं यह कह कर जयश्री ने कॉल काट दी।

कॉल काटने के बाद,

जयश्री ने आईने में देखा -और पहली बार, खुद को देखा।

बिना किसी मुखौटे के, बिना किसी शर्म के, बिना किसी पछतावे के।

उसने अपनी डायरी में लिखा:

“मैं टूटी थी, पर मैं झुकी नहीं।

मैंने खामोशी में बहुत कुछ सहा,

पर अब मैं बोल सकती हूँ - और सबसे पहले, खुद से।”

यह कि मैंने दीपक को तलाक दिया हैं।

अगले दिन जब वह स्कूल गई तो कुछ अलग थी।

चेहरे पर शांति थी, पर अब वो अंदर से थी पूरे आत्मविश्वास 

से भरी थीं अब जैसी बाहर थीं वैसे ही अंदर से थीं।

राघव पास आया और पूछा:

“आज कुछ हल्का लग रहा है?” और अच्छा भी लग रहा हैं।

“हाँ,” जयश्री मुस्कराई,

“क्योंकि आज मैं खुद पर भरोसा कर रही हूँ — पहली बार।

जयश्री मुस्कराते हुए राघव से कहती हैं-" विश्वास खोते देर नहीं लगती" पर विश्वास करने में उम्र बीत जाती हैं।

Sunday, July 27, 2025

तीज़ की रौनक

 हरियाली ओढ़े धरती मुस्काई,

बादल गगन में नाचे गाए,

नववधू-सी सजी ये प्रकृति,

तीज का उत्सव फिर से ले आई।


झूले पड़े हैं पीपल डाली,

हरियाली ने चूनर हैं डाली।

कंगन खनके, चूड़ी छनके,

सखियाँ मिलकर गीत हैं गाएँ।


पेड़ झूमते पवन के संग,

बाँध के झूले डाली पर,

सखियों संग, हँसी बिखर,

महके हर आँगन की डगर।


मेंहदी रचे, मन में उमंग,

श्रृंगार की बिखरी तरंग।

शिव-पार्वती का वरदान मिले,

हर सौभाग्यिनी का जीवन खिले।


सपनों के रंग सँवरे हैं,

मन के भाव निखरे हैं,

श्रृंगार में डूबी नारियाँ,

घूंघट में लाज से मुस्काई है।


पीहर की गलियों में चहकें,

सखियाँ सारी मिल जाएँ,

बचपन की यादें ताज़ा कर,

गीतों की गूँज फैल जाए।


हरियाली ओढ़े धरती मुस्काई,

बादल गगन में नाचे गाए,

नववधू-सी सजी ये प्रकृति,

तीज का उत्सव फिर से ले आई।

ईर्ष्या से आत्मबोध

 शालिनी की शादी को दस साल हो चुके थे। दो बच्चे, एक नौकरीपेशा पति, और एक रुटीन-सी जिंदगी। सुबह बच्चों के टिफ़िन, दोपहर घर की सफ़ाई, शाम में सबके चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने की कोशिश उसकी दुनिया बस इतनी ही थी।

एक दिन, स्कूल की रीयूनियन की ख़बर मिली । पहले तो शालिनी जाने को लेकर हिचक रही थी। क्या पहनूंगी? क्या बातें करूंगी? सबके पास कहने को बहुत कुछ होगा, मेरे पास क्या है? फिर पति ने समझाया, "जाओ न शालिनी, थोड़ा मूड बदल जाएगा ।" तुम्हें अपनी पुरानी दोस्तों से मिलकर अच्छा लगेगा अपने पति की बात मान वह जाने को तैयार हुई और गई। 

वहां शालिनी पहुंची उसको थोड़ा अटपटा लग रहा था वहाँ वह अपने दोस्तों से मिली तभी उसने एक लड़की को देखा ब्लैक साड़ी में आत्मविश्वास की एक चलती-फिरती परिभाषा, फ्रेंच एक्सेंट वाली हिंदी में सबको हँसाते हुए, वह और कोई नहीं उसी के साथ पढ़ने वाली सोनिया थीं। तभी उसकी मुलाकात सोनिया से हुई। सोनिया कॉलेज की सबसे शांत, सीधी, अपने धुन में मस्त रहने वाली लड़की थी, जिसे लोग ज्यादा नोटिस नहीं करते थे। पर अब वह पेरिस से लौटी थी, सफल फोटोग्राफर बनकर, उसने शादी नहीं की, दुनिया घूम रहीं थीं और उसकी हर बात में आत्मविश्वास झलकता था।  बताया, कैसे उसने अपनी नौकरी छोड़ी, खुद की गैलरी खोली, यूरोप घूमी, और अभी एक डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।

शालिनी मुस्कुराई, तालियाँ भी बजाईं, लेकिन उसके दिल के कोने में कुछ खिंच गया। शालिनी मुस्कुराई, गले मिली, बातें कीं लेकिन भीतर कहीं कुछ चुभा। रात को घर लौट कर शालिनी ने अपनी अलमारी खोली, एक पुराना स्केचबुक निकाला जो दस साल से बंद थी। धूल में लिपटे सपनों को देखकर उसकी आँखें भर आईं। जिसमें उसने कभी डिज़ाइनर बनने के सपने बुन रखे थे। वह सपने अब बच्चों की कॉपियों, दूध के बिलों, राशन की लिस्ट और रिश्तों की दरारों में कहीं दब चुके थे।

अगले कुछ दिनों तक शालिनी की आँखों से सोनिया का चेहरा नहीं गया। वो उस हँसी को याद करती रही जो जिम्मेदारियों की थकान से आज़ाद थी। फिर ईर्ष्या ने एक और रूप ले लिया अंदर का एक मौन विद्रोह। कुछ दिनों तक शालिनी चुपचाप रही। लेकिन कुछ बदल चुका था। ईर्ष्या अब कोई विकराल दानव नहीं थी, बल्कि एक सवाल बन गई थी।"क्या वाकई यह मेरी पूरी ज़िंदगी हैं? क्या अब कुछ और नहीं हो सकता?" उसके अंदर से आवाज आयीं कोशिश तो कर सकती हो बदलाव के लिए।

शालिनी ने फिर स्केच करना शुरू किया, चुपचाप, बिना किसी को बताए। कभी फूल, कभी चेहरे, कभी ऐसी स्त्रियाँ, जिनके पास पंख थे। किचन के कोने में, जब सब सोते थे, वह रंगों में अपनी चुप्पियाँ उकेरने लगी। ईर्ष्या ने उसे भीतर से तोड़ा, लेकिन उसी ने उसे फिर रचने की हिम्मत भी दी।

एक दिन उसकी छोटी बेटी ने पूछा,

"माँ, क्या आप भी पेंटिंग करती थीं?"

शालिनी चौंकी, फिर मुस्कुराई। "हां, कभी करती थी। अब फिर कर रही हूँ।"

धीरे-धीरे उसका मन रंगों से जुड़ने लगा। वो अपने पुराने इंस्टाग्राम अकाउंट पर स्केचेज़ डालने लगी बिना नाम के।

शालिनी के पति ने एक रात उसे किचन में स्केच करते देखा।

"तुम फिर से पेंटिंग कर रही हो?" उसने सर झुका लिया, "हाँ, ऐसे ही… बस मन कर गया।" पति थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला,

"तुमने यह सब पहले क्यों नहीं बताया?"

शालिनी का जवाब सीधा था,

"क्योंकि मैं खुद ही भूल गई थी कि मैं कौन थी।"

धीरे-धीरे घर में सबने उसे जगह देनी शुरू की। बेटी उसका iस्केचबुक स्कूल ले जाती, बेटी ने अपने दोस्तों को मम्मी की ड्रॉइंग दिखाई। इसी बीच सोनिया ने शालिनी प्रोफ़ाइल देख ली थी बिना नाम वाली वह प्रोफाइल। 

एक दिन उसका मैसेज आया:

"Is that you, Shalini ? I would love to work with you please be with us for our next women's art circle."

शालिनी देर तक स्क्रीन देखती रही। फिर अपनी खिड़की से बाहर देखा जहाँ कभी सपने खत्म हो गए थे, वहीं से एक नई शुरुआत दिख रही थी। 

ईर्ष्या हमेशा गलत या नुकसान करने के लिए नहीं होती कभी कभी ईर्ष्या आत्मबोध भी कराती है अपने को ढूँढने और सपनों को पंख भी लगाती हैं।

Friday, July 25, 2025

वर्तमान का बदलाव

 आजकल के लड़के... लड़कियों से शादी करने में डरने लगे हैं और उनके परिवार वाले भी यानी उनके माता-पिता भी, मालूम है क्यों ? क्योंकि पिछले कुछ महीनो से कुछ लड़कियों ने शादी करके या तो हनीमून पर ले जाकर अपने पति को मार दिया या घर में ही टुकड़े कर दिए या किसी ड्रम में सीमेंट के साथ जमा दिया। यह जो हो रहा है ना यह लड़कों के साथ पहली बार हो रहा है और इसीलिए उनके माता-पिता आज डर रहे शादी करने से इससे पहले अगर हम पीछे जाएं यानी अतीत में जाये तो उल्टा होता था तब लड़की के मां-बाप डरते थे शादी करने से कहीं ऐसा ना हो लड़का शादी करके छोड़ दे या दहेज के मामले में लकड़ी जला दी जाए या किसी और लड़की के चक्कर में उनकी लड़की को छोड़ दिया तो कई बार लड़कियां जान से मार दी गई है कई बार लड़कियां टुकड़ों में फ्रिज के अंदर भी मिली है तब यह लड़के के माता-पिता नहीं परेशान होते थे तब लड़की के माता-पिता परेशान होते थे और यह प्रक्रिया कई वर्षों से चली आ रही है लेकिन पिछले कुछ महीने से इसका उल्टा हो गया अब लड़के के माता-पिता परेशान होते हैं कि कहीं उनका लड़का मार दिया न जाए और इस बात का घोर विरोध हुआ खूब खबरें बनी, खूब बातें बनी लेकिन यह खबरें, यह बातें तब नहीं बनी जब लड़कियां मारी जा रही थी या जब लड़कियां मर रही थी।

यह बातें,  ख़बरें  तब बनी जब लड़कियों ने लड़कों को मारना शुरू कर दिया एक नया मुद्दा भी सामने आया की लड़कियां शादी कर रही है तलाक दे रही है और उसके बदले में अच्छी खासी रकम लेकर अलग हो रही है यह अभी कुछ ही महीनों, सालों से शुरू हुआ लड़के के माता-पिता तो बहुत परेशान हो गए की है कि हमने तो शादी की और बहू ऐसी निकल गई लेकिन थोड़ा पीछे जाइए आप कुछ भूल रहे हैं यह कई सालों से हो रहा है लड़कियों के साथ कि शादी करते थे और फिर किसी न किसी बहाने चाहे दूसरी औरत, चाहे पसंद नहीं थी, चाहे पढ़ी-लिखी नहीं थी, चाहे हमारे उसके सोच नहीं मिलती किसी भी कारण से बहाना बना कर लड़कियों को छोड़ दिया जाता था तब किसी को समस्या नहीं थी।

समाज कितना बदल रहा है समाज की मानसिकता कितनी दोगली है आज लड़के के मां-बाप को बहुत तकलीफ है की लड़कियां ऐसा करती है और तब कहां थे जब उन्हीं जैसी लड़कियों के साथ यह काम हो रहा था जब चोट अपने को लगती है ना तो दर्द भी खुद को होता है जब चोट दूसरे को रखती है तो दर्द का एहसास भी नहीं होता।

आज जिसको सुनो अगर वह लड़के का माता-पिता है तो वह बहुत परेशान है की अच्छी लड़कियां ही नहीं है आजकल तो किसी पर भरोसा ही नहीं कर सकते कि हमारे बच्चे को जान से मार दे तो शादी के बाद एक ही दो महीने बाद शादी का पैसा लेकर अलग हो जाए अच्छी खासी रकम लेकर  तब भी तो अच्छी लड़की नहीं थी जब लड़कियां घरों में जलाई जाती थी दहेज के लिए छोड़ दी जाती थी, जान से मार दी जाती थी दूसरी औरत के चक्कर में उन्हें छोड़ दिया जाता था तब यह समाज कहा था तब किसी लड़की की माता-पिता को यह नहीं लगता था कि कितना खतरा है हमारे बच्चे को यह समाज की दोहरी मानसिकता अगर इस बेटे की बड़ी बहन होगी तब उनकी मानसिकता अलग होगी लेकिन अगर वह वही बेटा जिसके घर में कोई लड़की नहीं है, कोई बहन नहीं है तो उनकी मानसिकता अलग होगी इतना दिखावा इतना झूठ इतना फरेब क्यों आज क्यों डर रहे हो कल करा था तब डरे थे आज जब तुम्हारे साथ हुआ तो सब गलत हो गया सब बुरे हो गए यह तो पिछले कई सालों से औरतों के साथ होता आ रहा है औरतें जलाई गई, मारी गई, टुकड़ों में फेंकी गई तब कहा था। समाज या तब कहां थे यह समाज के ठेकेदार जो अब बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।

Thursday, July 24, 2025

वक़्त

दीप्ति और अखिलेश की शादी को चौदह बरस हो चुके हैं। दोनों का विवाह परिवार की रजामंदी से और परिवार की ही पसंद से हुआ था। दीप्ति और अखिलेश दोनों के पसंद स्वभाव और विचार एक दूसरे से मेल नहीं खाते थें। दीप्ति को फिर भी लगता था समय के साथ-साथ दोनों के विचार एक दूसरे को समझ आने लगेंगे।
दीप्ति जो कि स्वभाव से शांत, सहनशील और समझदार थी वही अखिलेश उसके बिल्कुल विपरीत स्वभाव में उछरंकल, महत्वाकांक्षी था।
दीप्ति दिन भर अपना समय घर के कामों और उसके बाद के समय को कहानी, उपन्यासों को पढ़ने में बिताती थीं। अखिलेश को सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने और नौकरी के साथ अपना खुद का काम करने की धुन सवार रहती थीं।
अखिलेश अपने पैसे और काम के चक्कर में दीप्ति को अनदेखा करता चला आ रहा था उसको इसका एहसास भी नहीं था कि दीप्ति उसके इस व्यवहार से अकेलेपन का शिकार हो रही हैं वहीं दूसरी ओर दीप्ति खुद को अकेलेपन से बचाने के लिये किताबों में खोती जा रही थीं।
अखिलेश के इस स्वभाव से  दोनों में  दूरियां बढती जा रहीं थीं।
ऐसा नहीं कि दीप्ति ने इन चौदह सालों में कभी इस आयी दूरी को कम करने की कोशिश न की हो। शादी के शुरूआती सालों में दीप्ति ने बहुत कोशिश की पर अखिलेश के स्वभाव और बातों ने उसे बहुत आहत किया। अखिलेश से जब भी दीप्ति अपने लिए समय मांगती या कहीं साथ चलने के लिए कहती तो अखिलेश का यही जवाब आता कि थोड़ा समझदार बनो यह बातचीत,घूमना फिरना, एक दूसरे को समझना और एक दूसरे के साथ समय बिताने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी हैं अभी वक़्त है सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का। दीप्ति जब भी कहती तुम्हें नहीं लगता हममे काफ़ी दूरियां हैं तो अखिलेश का जवाब होता घर में खाली बैठीं रहती हो किस्सा कहानी पढ़ती रहती हो इसी लिए ये सब बातें तुम्हारे दिमाग में चलती है। अखिलेश का मानना था '' वक़्त से तेज चलो तभी जीतोगे''। "टाइम इज मनी"।
धीरे- धीरे दीप्ति अखिलेश से दूर हो गई उसने खुद को किताबों में कैद कर लिया समय के साथ अपने को व्यस्त करने के लिए एक स्कूल में नौकरी कर ली। अब दीप्ति भी खुद में व्यस्त हो गई अब उस पर अखिलेश के व्यवहार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। समय गुजर रहा था इसी बीच ऐसे कई मौके आते और जाते गए जब दोनों में बहस होती और बातचीत बंद हो जाती इस सिलसिले की वजह से दोनों में बातचीत कम हो गई अब घर के काम या रिश्तेदारों के यहां आने जाने के विषय में दोनों के बीच बात होती और कभी कभार उसका अंत भी बहस या लड़ाई पर होता।
इधर अचानक ही अखिलेश की कुछ तबीयत खराब रहने लगी पर उसे पैसा कमाने की ऐसी धुन सवार थीं कि उसने अपनी सेहत की अनदेखा करना शुरू कर दिया। कहतें है ना कि waqt की मार बहुत बुरी होती हैं एक दिन अचानक अखिलेश ऑफिस में बेहोश हो गया आनन-फानन में emergency में पास के हॉस्पिटल ले जाया गया। दीप्ति को भी स्कूल में सूचना मिली कि अखिलेश हॉस्पिटल में है वह भी झट से हॉस्पिटल पहुंची तब तक अखिलेश को होश नहीं आया था तभी अखिलेश के ऑफिस के साथी से मुलाकात हुई दीप्ति की जिससे पता चला कि अखिलेश पिछले एक महीने से बहुत परेशान चल रहे थे क्योंकि अखिलेश को ऊपर से ऑर्डर आए थे कि अगर वह अपना काम सही से नहीं और समय पर नहीं देंगे तो उन्हें हटा दिया जाएगा और पिछले 6 महीने पहले अखिलेश जिस कंपनी में काम करते है उसको घाटा हो गया जिसकी वजह से बहुत से लोगों को काम से निकाल दिया गया था। अखिलेश को नौकरी जाने का बहुत अधिक डर था और वह अपना जो खुद का काम शुरू किया था उसको भी समय नहीं दे पा रहा था और उसके दोस्त ने बताया कि अक्सर उसके सर में दर्द रहता था हम लोगों ने कई बार कहा डॉक्टर को दिखा दो पर वह कहता अभी वक़्त नहीं है जब होगा तब दिखा देगा ऐसी कोई दिक्कत उसे है नहीं और वह दर्द की दवा खा कर काम में लगा रहता। दीप्ति यह सब सुन अचंभे में थी कि उसे यह सब कैसे नहीं पता लगा क्या वह वाकई वह अखिलेश से दूर हो गई या अपने में इतनी मशगूल हो गई कि आस-पास की खबर उसे रही नहीं।
तभी अखिलेश को होश आता है और वह अपने को हॉस्पिटल के बिस्तर पर और चारों तरफ खुद को लोगों से घिरा पाता है उस समय अखिलेश कुछ भी बोलने उचित नहीं समझता वह यह अब तक दीप्ति के चेहरे से अंदाजा लगा चुका था कि पिछले दिनों की सारी जानकारी दीप्ति को हो चुकी हैं तभी डॉक्टर आते है और कुछ जाँचें करने के बाद अखिलेश को आराम करने और सभी को बाहर जाने को कहते हैं। सभी बाहर चले जाते हैं अखिलेश मन ही मन आशंकित होता है कि उसको क्या हुआ है उधर डॉक्टर बाहर निकालते ही दीप्ति से कहता है इनका बी पी बहुत हाई था यह दवा समय पर नहीं लेते क्या दीप्ति ने कहा पर इनको बीपी की कोई समस्या नहीं रहती यह कोई दवा बीपी की नहीं लेते। डॉक्टर ने कहा पर बीपी की दवा अब रेगुलर लेनी पड़ेगी और इन्हें माइनर हार्ट अटैक आया था इसलिए लिए अब इन्हें अपनी सेहत का बहुत ध्यान रखने की जरूरत है और अभी तो यह बेड रेस्ट पर रहेंगे।
दीप्ति डॉक्टर की बातें सुनकर घबरा गई तो डॉक्टर ने समझाते हुए कहा घबराने की जरूरत नहीं है अभी कोई खतरा नहीं है पर आगे के लिए सतर्क और ध्यान रखने की जरूरत है और अभी तो सिर्फ आराम की जरूरत है।
दीप्ति डॉक्टर की बात सुन कर इस सोच में थीं कि अब वह अखिलेश को कैसे समझायेगी उसके लिए तो पैसा और नौकरी सबसे पहले है वह कैसे आराम करेगा खुद को कैसे समझायेगा दीप्ति खुद से सवाल कर उधेड़बुन मे लगी हुई थी।
कुछ देर बाद दीप्ति अखिलेश के कमरे में जाती है अखिलेश खिड़की के बाहर शून्य की ओर देख रहा था दीप्ति के कमरे में आने के बाद अखिलेश की तन्द्रा टूटी वह दीप्ति की ओर देख कर नज़रे झुका लेता है। दीप्ति अखिलेश के करीब बैठ कर उसका हाथ अपने हाथों में लेती है और कहती हैं आप बिल्कुल परेशान न होइए आप बिल्कुल ठीक है डॉक्टर ने बोला कोई परेशानी की बात नहीं बस कुछ दिन आराम की जरूरत है पर डॉक्टर ने एक बात कहीं हैं शायद आप सुन कर थोड़ा परेशान होंगें अखिलेश दीप्ति की ओर देखते हुए प्रश्न भरी नजरों से दीप्ति ने आगे कहा उन्होंने कहा अब कुछ दिन घर में रह कर घर के काम में बीवी का हाथ बताना पड़ेगा और उससे ढ़ेर सारी बातें करनी पड़ेगी और सुननी भी पड़ेगी यह कह कर दीप्ति अखिलेश की ओर देख कर हँस दी और उसकी यह बात सुन कर अखिलेश का चेहरा भी खिल गया जो अभी तक मुरझाया हुआ था।
अभी तक जो परेशानी अखिलेश को दीप्ति के चेहरे पर दिख रही थी वह अब गायब थी उसका चेहरा आत्मविश्वास से भरा हुआ था और अखिलेश भी मन ही मन यह विचार कर रहा था कि वक्त बहुत बलवान है पूरे जीवन मैं उसके आगे भागता रहा और अपनी पत्नी को इंतजार कराया आज उसी वक्त ने ऐसी मार मारी की अब वही पत्नी मेरी साथी है और वक्त तेजी से आगे भाग रहा हैं।

शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस की सभी को अनंत शुभकामनाएं आप सबके जीवन की पहली शिक्षिका तो माँ हैं पर दूसरी शिक्षिका या शिक्षक स्वयं जिंदगी है बहुत कुछ सिखाती ...